मंदिर जी परिचय
श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र वेहलना जी से 38 किलोमीटर की दूरी पर मीरापुर गाँव में स्थित है। मंदिर जी के निर्माण से पूर्व यहाँ एक चैत्यालय हुआ करता था। बाद में जैन समाज द्वारा चैत्यालय को मंदिर जी का रूप देने का निर्णय लिया गया। सन् 1860 में जैन समाज के द्वारा पाँच सौ गज भूमि को खरीदकर मंदिर जी का निर्माण किया गया। चैत्यालय की वेदी में विराजित सभी प्रतिमाओं को मंदिर जी में स्थापित किया गया था।
मंदिर जी में मूलतः एक वेदी है जिसमें मूलनायक प्रतिमा श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान जी की है। यह प्रतिमा जी लगभग 600 वर्ष प्राचीन है तथा बहुत ही अतिशयकारी बताई जाती है। जो सफेद पाषाण से निर्मित है। वेदी में ही श्री चन्द्रप्रभु भगवान जी की पाँच सौ वर्ष प्राचीन प्रतिमा के साथ में ही श्री वासुपूज्य भगवान, श्री आदिनाथ भगवान, श्री पार्श्वनाथ भगवान एवं अन्य प्राचीन प्रतिमाएँ विराजमान है। दुर्भाग्यवश कुछ प्रतिमाएँ मंदिर जी से चोरी भी हो गई थी जिनमें श्री पार्श्वनाथ भगवान जी की प्रतिमा भी थी।
कुछ समय पश्चात पार्श्वनाथ भगवान जी की चोरी हुई प्रतिमा जैन समाज के व्यक्ति को किसी गाँव में दिखाई देती है। उपरान्त समस्त जैन समाज द्वारा मिलकर संघर्ष करके प्रतिमा जी को प्राप्त कर मंदिर जी में लाकर विराजित कर दिया जाता है। मंदिर जी के ऊपर 51 फीट ऊँचे संगमरमर से निर्मित शिखर जी का निर्माण किया गया है। वर्तमान में मंदिर जी को पंचायती मंदिर जी के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर जी का संचालन श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर समिति मीरापुर द्वारा किया जाता है।
समाज एवं सुविधाएं
मीरपुर में जैन परिवारों की संख्या अन्य समाज से कम है लेकिन जैन समाज द्वारा सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया जाता है। कम संख्या होने के बावजूद स्थानीय जैन समाज द्वारा मंदिर समिति का निर्माण किया गया है। समिति द्वारा ही मंदिर जी के संचालन की व्यवस्था की जाती है। मंदिर जी में आने वाले श्रावकों के लिए सभी प्रकार की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है। यदि कोई यात्री किसी दूर के क्षेत्र से मंदिर जी में दर्शन करने आता है तो उनके लिए रुकने की व्यवस्था भी समिति द्वारा उपलब्ध की जाती है। यह मंदिर जी वेहलना जी अतिशय क्षेत्र से लगभग 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हस्तिनापुर वेहलना जी मार्ग पर से जाते हुए जैन मुनि महाराज जी का क्षेत्र में आगमन होता रहता है। उनके रुकने की व्यवस्था के रूप में कमरों का निर्माण किया गया है। महाराज जी के प्रवचनों के लिए एक बड़े हॉल का निर्माण किया गया है ताकि लोग उनके प्रवचनों को सुनकर, समझकर उन्हें अपने जीवन में उतार सकें और अमल करके सफलता की दिशा में आगे बढ़ सकें।
मुज्जफरनगर क्षेत्र के बारे में
मुज्जफरनगर का क्षेत्रफल 4049 वर्ग किलोमीटर में है। मुज्जफरनगर दिल्ली से लगभग 116 किमी दूर उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी सीमाएँ हरियाणा और राजस्थान से मिलती हैं। यह राष्ट्रीय राज मार्ग 58 पर सहारनपुर मण्डल के अंतर्गत गंगा और यमुना के दोआब में, दक्षिण में मेरठ और उत्तर में सहारनपुर जिलों के बीच स्थित है। यह क्षेत्र विभिन्न धार्मिक स्थलों के लिए महत्वपूर्ण है। गंगा यमुना के संगम पर बसे इस क्षेत्र में कई तीर्थ स्थल हैं जैसे कि शुक्राताल, तांदा, अंबा बारा, भिट्ठौड़ा, और मन्दीरा घाट आदि। यहाँ के त्योहार और मेले भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। इस ज़िले में कई प्राचीन राजमहल और राजा-महाराजा के महल हैं, जो ऐतिहासिक महत्व के हैं और पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। यहाँ की हिंदी और उर्दू प्रमुख भाषाएँ हैं, लेकिन अन्य भाषाएँ भी यह पर बोली जाती हैं, जैसे कि हरियाणवी और राजस्थानी।
मुजफ्फरनगर एक महत्वपूर्ण औद्योगिक शहर है, चीनी, इस्पात, कागज और सिले सिलाये कपड़े और हाथ की कशीदाकारी से बने महिलाओं के सूट के लिए प्रसिद्ध है। गन्ना के साथ अनाज यहाँ के प्रमुख उत्पाद है। यहाँ की ज़्यादातर आबादी कृषि में लगी हुई है जो कि इस क्षेत्र की आबादी का 70% से अधिक है। मुजफ्फरनगर का गुड़ बाजार एशिया में सबसे बड़ा गुड़ का बाजार है। मुजफ्फरनगर में गन्ना भारत में सबसे अधिक पैदा होता है, गन्ने के मिल भी सबसे ज्यादा संख्या में मुजफ्फरनगर है।
समिति
स्थानीय जैन समाज द्वारा मंदिर जी के सुचारु रूप से संचालन के लिए समिति का निर्माण किया गया है। समिति में कार्यरत सदस्य इस प्रकार है -
प्रधान - श्री पीयूष कुमार जैन
सचिव - श्री शुभम जैन
सदस्य - श्री पवन कुमार जैन
सदस्य - श्री अजय कुमार जैन




