मंदिर जी का परिचय
दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में स्थित श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर एक भव्य एवं आध्यात्मिक स्थल है, जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु मानसिक शांति प्राप्त करने और धर्म आराधना के लिए आते हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि समाज सेवा और सांस्कृतिक समर्पण का एक जीवंत प्रतीक भी है। मंदिर का निर्माण वर्ष 2000 में आरंभ हुआ और समय के साथ यह समूचे क्षेत्र में जैन समाज की धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया। मंदिर तक पहुँचने के लिए सबसे निकटतम प्रमुख स्थल मधुबन चौक - सेक्टर 8 है, जो रोहिणी ईस्ट मेट्रो स्टेशन के पास स्थित है। यह एक प्रमुख लैंडमार्क होने के कारण मंदिर तक पहुँचना अत्यंत सुगम है।
श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर की निर्माण यात्रा वर्ष 1995 में प्रारंभ हुई, जब मंदिर के निर्माण हेतु एक भूखंड खरीदा गया। इसके पश्चात, वर्ष 2000 में विधिवत रूप से निर्माण कार्य आरंभ हुआ। इस पावन कार्य को मूर्त रूप देने के लिए ‘दिगंबर जैन सभा’ नामक एक समिति का गठन किया गया। इस समिति में श्री नवीन चंद जैन, श्री अतुल जैन, श्री कैलाश चंद जैन, श्री ला. महेश चंद जैन (कलकत्ते वाले ) सहित अन्य समर्पित कार्यकारिणी सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। समाज के सामूहिक प्रयासों एवं समर्पण के परिणामस्वरूप यह मंदिर आज एक भव्य स्वरूप में हमारे समक्ष स्थापित है। आगे चलकर, वर्ष 2005 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा समारोह अत्यंत श्रद्धा एवं धूमधाम से संपन्न हुआ। यह ऐतिहासिक आयोजन आचार्य श्री 108 बाहुबली महाराज जी के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ, जिससे मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा और भी अधिक बढ़ गई।
मंदिर के निर्माण में जोधपुर के कोटा पत्थर और पारंपरिक स्थापत्य शैली का प्रयोग किया गया है, जिससे इसकी भव्यता और कलात्मकता अनुपम प्रतीत होती है। मंदिर में स्थित मूल वेदी पर देवाधिदेव श्री 1008 आदिनाथ भगवान विराजमान हैं, जिन्हें श्रद्धापूर्वक ‘रोहिणी वाले बड़े बाबा’ के नाम से जाना जाता है। इसी वेदी पर भगवान चंद्रप्रभु, भगवान शांतिनाथ, भगवान मुनिसुव्रतनाथ सहित अन्य तीर्थंकरों की दिव्य प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं, जो श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति प्रदान करती हैं।
मंदिर में कुल दो वेदियाँ स्थापित की गई हैं - भूतल पर स्थित मूल वेदी और प्रथम तल पर स्थित द्वितीय वेदी। प्रथम तल की वेदी पर भगवान आदिनाथ, भगवान पार्श्वनाथ और भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमाएँ विराजमान हैं, और यहाँ पर भी प्रतिदिन पूजा, अभिषेक और शांतिधारा का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु नियमित रूप से पूजा-अर्चना, अभिषेक एवं शांतिधारा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। मंदिर में सभी प्रमुख जैन पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। विशेष रूप से वार्षिक रथयात्रा का आयोजन हर वर्ष फरवरी माह में किया जाता है। यह 12 फरवरी को पंचकल्याणक प्रतिष्ठा दिवस के उपलक्ष्य में निकाली जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में समाजजन भाग लेते हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक भावना को प्रबल करता है, बल्कि समाज की एकता एवं समर्पण को भी दर्शाता है।
जैन समाज एवं सुविधाए
मंदिर के आसपास जैन समाज के लगभग 125 परिवार निवास करते हैं, जिनके सदस्य प्रतिदिन पूजा-अर्चना के लिए मंदिर आते हैं। प्रतिदिन लगभग 70-80 श्रद्धालु मंदिर में उपस्थित रहते हैं, जिनमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी शामिल होते हैं। मंदिर न केवल आध्यात्मिक केंद्र के रूप में कार्य करता है, बल्कि समर्पित सेवा भाव के साथ ‘आदिनाथ चैरिटेबल ट्रस्ट’ का भी संचालन करता है। इस ट्रस्ट के माध्यम से निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन किया जाता है, जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टर प्रतिदिन समाज को अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं। साथ ही, मुनिराजों एवं उनके साथ आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए मंदिर द्वारा ‘संत निवास’ की विशेष व्यवस्था की गई है। इस निवास स्थल में 12 वातानुकूलित कक्ष उपलब्ध हैं, जहाँ मुनि संघ को सभी आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। यह उत्कृष्ट व्यवस्था मंदिर की सेवा भावना और संत-सम्मान की समृद्ध परंपरा को दर्शाती है।
दिल्ली क्षेत्र के बारे में
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) दिल्ली, भारत की राजधानी और एक केंद्र शासित प्रदेश है। इसकी राजधानी होने के कारण केंद्र सरकार की तीनों प्रमुख इकाइयाँ—कार्यपालिका, संसद और न्यायपालिका—यहीं स्थित हैं। यमुना नदी के किनारे बसे इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है, जिसका उल्लेख विभिन्न पुराणों में मिलता है। यह भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक है, और इसके इतिहास की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में हुई पुरातात्विक खुदाई से इसके प्रमाण मिले हैं।
दिल्ली का राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व विशेष रूप से दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ बढ़ा, जब यह एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ। यहाँ कई प्राचीन और मध्यकालीन इमारतों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। दिल्ली का सबसे प्राचीन उल्लेख महाभारत में मिलता है, जहाँ इसे इन्द्रप्रस्थ के रूप में वर्णित किया गया है। महाभारत काल में इन्द्रप्रस्थ पांडवों की राजधानी थी। आज, दिल्ली न केवल भारत की राजनीतिक राजधानी है, बल्कि एक प्रमुख पर्यटन केंद्र भी है। राजधानी होने के कारण यहाँ भारत सरकार के कई महत्वपूर्ण कार्यालय, राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, और केंद्रीय सचिवालय जैसे आधुनिक स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण मौजूद हैं। इतिहास और संस्कृति के दृष्टिकोण से दिल्ली का विशेष महत्व है। यहाँ कई विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्मारक हैं, जिनमें पुराना किला, सफदरजंग का मकबरा, जंतर मंतर, कुतुब मीनार और लौह स्तंभ प्रमुख आकर्षण हैं।
दिल्ली विभिन्न धर्मों के लिए भी आस्था का केंद्र है। यहाँ बिरला मंदिर, कात्यायिनी शक्तिपीठ, लाल जैन मंदिर, बंगला साहिब गुरुद्वारा, बहाई मंदिर (लोटस टेंपल), अक्षरधाम मंदिर और जामा मस्जिद जैसे प्रमुख धार्मिक स्थल स्थित हैं। इसके अतिरिक्त, भारत के अमर शहीदों की स्मृति में इंडिया गेट का निर्माण किया गया है, जो राजधानी के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। वर्तमान समय में, दिल्ली न केवल भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक राजधानी है, बल्कि देश के व्यापार और वाणिज्य का एक प्रमुख केंद्र भी बन चुकी है।
समिति
मंदिर जी के समुचित संचालन एवं व्यवस्थापन के लिए 16 सदस्यों की एक समिति का गठन किया गया है, जो पूर्ण निष्ठा, कुशलता और समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही है। वर्तमान समिति के सदस्य निम्नलिखित हैं:
संरक्षक: श्री शांतिलाल सेठिया, श्री नवीन कुमार जैन, श्री फिरोज़ी लाल जैन
मार्गदर्शक: श्री अतुल कुमार जैन
अध्यक्ष: श्री कैलाशचंद जैन बड़जात्या
उपप्रधान: श्री बीर सेन जैन, श्री सुरेन्द्र कुमार जैन
महामंत्री: श्री प्रवीण जैन
सह सचिव: श्री राकेश कुमार जैन
कोषाध्यक्ष: श्री अनंत जैन
भंडारी: श्री नवीन कुमार जैन
कार्यकारणी सदस्य: श्री बुद्ध सेन जैन, श्री नेमी चन्द जैन, श्री नरेन्द्र कुमार जैन, श्री सुनील जैन
आमंत्रित सदस्य: श्री मुकेश कुमार जैन, श्री अजय कुमार जैन, श्री रविन्द्र कुमार जैन

















